Monday, January 3, 2011

देश में चोर को पुलिस का बॉस बना दिया गया है

आरटीआई एक्टिविस्ट अरविंद केजरीवाल की शिकायत है कि देश में चोर को पुलिस का बॉस बना दिया गया है , इसलिए वह तमाम बड़े लोगों को लेकर ' इंडिया अगेंस्ट करप्शन ' की मुहिम शुरू करने जा रहे हैं। उनसे तमाम मुद्दों पर खुलकर बातचीत की khabarwala ने:

करप्शन के मामले में कैसी सजा होनी चाहिए ?
दो मुद्दे हैं। एक , सजा कितनी हो और दूसरा , सजा के चांस कितने हैं। हमारे देश में भ्रष्टाचार कानून में छह महीने से सात साल की सजा है। इसका कोई असर नहीं होता। जहां तक सजा होने के चांस की बात है तो जितने पावरफुल व सीनियर आप हैं , आपको सजा मिलने के चांस उतने ही कम होते जाते हैं। मंत्री हैं , तो सजा हो ही नहीं सकती। चोर पुलिस का बॉस बना फिर रहा है। ऐसे में पुलिस अपने बॉस को सजा कैसे दे सकती है ?

भारत में कैसी जांच एजेंसी और सजा के कैसे प्रावधान होने चाहिए ?
हमारे देश में अभी भी अंग्रेजों के जमाने के कानून चल रहे हैं। देश को आर्थिक तौर पर चूना लगाना देशद्रोह नहीं है , लेकिन उन आर्थिक चूना लगाने वालों के खिलाफ आवाज उठाना , ऐसे लोगों से घृणा करना आईपीसी की धारा 124-ए के तहत देशदोह है। अगर जॉइंट सेक्रेट्री या उससे ऊपर का कोई अफसर , मंत्री या कॉरपोरेट घराना भ्रष्टाचार करते पाया जाए तो इसे देशद्रोह माना जाना चाहिए। जांच एजेंसियां हमारे देश में बहुत हैं लेकिन ऐसी कोई भी नहीं है जो सरकार के कंट्रोल से बाहर हो और जिसके पास पावर्स हों।

फेसबुक पर इंडिया अगेंस्ट करप्शन की मुहिम से जुड़ें

सीबीआई के पास पावर्स हैं तो वह आजाद नहीं है और सीवीसी स्वतंत्र है तो उसके पास पावर्स नहीं हैं। इन सबको इकट्ठा करके एक लोकपाल बनाया जाए जो सरकार से मुक्त हो। राजनेता , अफसर और जज भी उसके दायरे में आते हों और उसके पास इतनी ताकत हो कि वह किसी के भी खिलाफ मुकदमा चला सके।

भारत में ज्यादातर करप्शन के मामलों में सजा क्यों नहीं हो पाती ?
क्योंकि उनमें ईमानदार तहकीकात हो ही नहीं पाती। इसके दो कारण हैं। एक तो यह कि तहकीकात करने वाली एजेंसी उन्हीं लोगों के तहत आती है जिन्होंने चोरी की है और दूसरी , तहकीकात करने वाली एजेंसी के अंदर खुद भ्रष्टाचार है।

' इंडिया अगेंस्ट करप्शन ' मुहिम आपने शुरू की है। वह क्या है ?
हमारा देश एक के बाद एक भ्रष्टाचार के मामलों में उलझता जा रहा है। हर रोज मामले सामने आ रहे हैं पर व्यवस्था को ठीक करने की कोई बात नहीं कर रहा। इसे देखते हुए अब किरण बेदी , अन्ना हजारे , स्वामी रामदेव , श्रीश्री रविशंकर व स्वामी अग्निवेश आदि ने व्यवस्था में बदलाव लाने के लिए यह आंदोलन शुरू किया है।

सिर्फ रैली करने से क्या होगा ? पॉलिटिकल सपोर्ट भी तो इकट्ठा कीजिए ?
पॉलिटिकल सपोर्ट तो लोगों से आएगा , न कि पॉलिटिकल पार्टियों के सामने गिड़गिड़ाने से। रैली में अगर बड़ी संख्या में लोग उतरेंगे , तो पॉलिटिकल सपोर्ट अपने आप आएगा। ऐसे लोगों का वोट बैंक तैयार किया जा रहा है जो उसी पार्टी को वोट देंगे , जो भ्रष्टाचार के खिलाफ बिल को पारित करेगी।

आपके द्वारा बनाया गया लोकपाल बिल सरकार द्वारा बनाए गए लोकपाल बिल से किस तरह अलग है ?
सरकार द्वारा बनाए गए बिल में सिर्फ राजनेता आते हैं , अफसरों और जजों के खिलाफ वह जांच नहीं कर सकता , जबकि नेता और अफसर मिलकर भ्रष्टाचार करते हैं। किसी भी केस में यही सबसे बड़ी अड़चन है। दूसरा , सरकारी बिल में लोकपाल सरकार को मुकदमा चलाने की सिर्फ सलाह दे सकता है , खुद मुकदमा नहीं चला सकता। आज अगर लोकपाल होता और 2-जी मामले में पीएम को सलाह देता कि ए. राजा के खिलाफ मुकदमा चलाइए तो क्या हमारे पीएम ऐसा कर पाते ? सरकारी लोकपाल बिल महज एक शोपीस है।

सीबीआई को लोकपाल में मिलाने से क्या फर्क पड़ेगा ?
हमें नई पोस्ट नहीं बनानी पड़ेंगी। पहले से मौजूद एजेंसियों को ही कारगर बनाया जाएगा।

आप विकीलीक्स की तर्ज पर कुछ कीजिए। नामों के साथ आगे आइए। सिर्फ आवाज उठाने से क्या होगा ?
मैं मानता हूं कि सारी चीजें बाहर व सामने आनी चाहिए। जो रोल मीडिया ने कॉमनवेल्थ गेम्स , आदर्श घोटाले , कर्नाटक स्कैम व माइनिंग स्कैम के दौरान निभाया है , वह कम नहीं है , पर जेल कोई नहीं गया। हम तो उसके बाद की बात कर रहे हैं। एक साल में मुकदमा निपट जाना चाहिए।

क्या आप आरटीआई के मौजूदा स्वरूप को ठीक मानते हैं ?
बहुत अच्छा है , पर उसकी सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि सूचना आयुक्तों के चयन की प्रक्रिया का उसमें वर्णन नहीं है। इसलिए सरकार ऐसे लोगों को सूचना आयुक्त बना देती है , जो महाभ्रष्ट हैं।

सरकार आरटीआई में जो संशोधन करने जा रही है , उन्हें आप कैसा मानते हैं ?
सरकार आरटीआई से बौखलाकर हर वह कोशिश कर रही है , जो आरटीआई को कमजोर कर सके। वजह साफ है , जितने भी घोटाले हुए हैं , उनमें से कई आरटीआई की वजह से सामने आए हैं।

अब तक आपने ऐसी कौन सी आरटीआई दाखिल की है जिसने आपको सबसे ज्यादा संतोष दिया हो ?
जब मैंने एक नन्नू नाम के मजदूर से आरटीआई डलवाई। उससे राशन कार्ड बनवाने के लिए पांच हजार रुपये रिश्वत मांगी जा रही थी। दूसरा , जब दिल्ली सरकार , दिल्ली की जल व्यवस्था को चार विदेशी कंपनियों को बेचने की योजना बना चुकी थी। आरटीआई के बाद सरकार को यह योजना वापस लेनी पड़ी।

जो अफसर आरटीआई का जवाब नहीं देते , उनके खिलाफ क्या होना चाहिए ?
कानून में उनके खिलाफ सजा का प्रावधान है। उन पर 25 हजार का जुर्माना लगाने व गिरफ्तार करने का प्रावधान है , पर हमारे सूचना आयुक्त जो पार्टियों के वफादार हैं , न जुर्माना लगाते हैं , न गिरफ्तारी करवाते हैं।

आरटीआई की अपीलों के जो ढेर लग गए हैं , उस पर आपका क्या कहना है ?
वह इसीलिए लगे हैं क्योंकि भ्रष्ट लोगों की वजह से डर खत्म हो गया है।

बीजेपी के लिए नए दोस्त खोजेंगे जसवंत

नई दिल्ली। । पार्टी में वापसी के बाद बीजेपी के सीनियर नेता जसवंत सिंह को दूसरी पार्टियों के साथ संबंधों में सुधार लाने और गठबंधन को बढ़ाने की जिम्मेदारी सौंपी गई। पार्टी ने एक बयान में कहा, 'राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी ने जसवंत सिंह को सभी राजनीतिक पार्टियों से संबंध सुधारने और लगातार संपर्क बनाए रखने का कार्य सौंपा है।'

जसवंत के 24 जून 2010 को पार्टी में लौटने के बाद कोई बड़ी जिम्मेदारी नहीं सौंपी गई थी। पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने कहा था कि सिंह के लौटने से वह खुश हैं और इससे वह राहत महसूस कर रहे हैं।

हाल में बिहार चुनावों में ऐतिहासिक जीत के बाद बीजेपी ने और दलों के साथ गठबंधन करने और उन्हें एनडीए के पाले में लाने का निर्णय किया। उसने वर्तमान सहयोगियों के साथ भी गठबंधन को और मजबूत करने पर जोर दिया। जसवंत सिंह की भूमिका इसी दिशा में काम करने की होगी।

यह फैसला इस बात का भी संकेत है कि जसवंत सिंह और उमा भारती जैसे नेताओं की वापसी की योजना बनाने वाले गडकरी उन्हें अधिक जिम्मेदारी भी देना चाहते हैं। अटल बिहारी वाजपेयी के निकट सहयोगी रहे बीजेपी के इस वरिष्ठ नेता को विवादास्पद किताब के लिए अगस्त 2009 में शिमला चिंतन बैठक में पार्टी से निकाल दिया गया था। उन्होंने अपनी विवादास्पद पुस्तक में पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना की प्रशंसा की थी और विभाजन के लिए जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल को जिम्मेदार ठहराया था।

कांग्रेस की किताब में चीन से लड़ाई का जिक्र नहीं

नई दिल्ली।। कांग्रेस द्वारा हाल ही में पेश भारतीय इतिहास के ब्यौरे में भारत-चीन के बीच 1962 में हुए युद्ध का जिक्र नहीं है। हालांकि, पाकिस्तान के साथ हुई जंग और उसके बाद बांग्लादेश बनने की कहानी इसमें विस्तार से दी गई है।

कांग्रेस की किताब में यह भी जिक्र है कि 1965 में जब पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ पूरी तरह से जंग शुरू की थी, तत्कालीन प्रधानमंत्री प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने दुनिया को दर्शाया था कि भारत किस तरह कम से कम संसाधनों के साथ अपनी धरती की रक्षा कर सकता है।

किताब में कहा गया कि 1971 की जंग को इंदिरा गांधी की निजी सफलता के रूप में देखा गया। कुल मिलाकर उन्होंने बांग्लादेश को लेकर दुनिया भर में सहमति कायम की और अमेरिका को छोड़कर वह दुनिया के हर प्रमुख देश की राजधानी की यात्रा पर गईं। इसमें कहा गया कि 1974 में भारत ने सफलतापूर्वक परमाणु परीक्षण किया और परमाणु क्लब का सदस्य बना। लेकिन 'कांग्रेस ऐंड द मेकिंग ऑफ द इंडियन नेशन' नामक किताब में 1962 में चीन के साथ हुई जंग का कोई जिक्र नहीं है।

इस किताब को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया ने गांधी ने हाल ही में कांग्रेस महाधिवेशन के दौरान जारी किया था। किताब के मुख्य संपादक वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी हैं। मुखर्जी के मुताबिक, 'यह किताब कांग्रेस के 125 साल पुराने इतिहास की झलक को पेश करती है।'

संजय गांधी किसके? बीजेपी या कांग्रेस के

यह देश की राजनीतिक विडंबना ही है कि कांग्रेस संजय गांधी पर इमर्जेंसी में ज्यादती करने का आरोप लगा रही है और बीजेपी संजय गांधी के पक्ष में दिख रही है।

संजय गांधी ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि जिस पार्टी के नेताओं को वह 19 महीनों के लिए जेल की काल कोठरी में बंद कर रहे हैं, वही पार्टी उनके पक्ष में बोलेगी और जिस परिवार को बढ़ाने के लिए उन्होंने यह किया, वही परिवार उनके योगदान को नकार देगी।

संजय गांधी ने अपनी मां के 1977 के चुनावों की हार का 1980 लोकसभा चुनावों में भारी जीत से बदला लेने में काफी अहम भूमिका निभाई। संजय की मौत के 30 साल बाद भी उनकी छवि विवादास्पद बनी हुई है। कांग्रेस ने 125वीं वर्षगांठ के मौके पर पार्टी के इतिहास पर किताब जारी की है। यह महत्वपूर्ण है कि संजय गांधी पर अपनी चुप्पी तोड़ते हुए कांग्रेस ने आलोचनात्मक रवैया अपनाया है। राहुल गांधी के 'राजतिलक' से पहले कांग्रेस अपने को साफ-सुथरा कर लेना चाहती है। मुस्लिमों, आदिवासियों और दलितों में कांग्रेस अपने वोट को फिर से बढ़ाना चाहती है। जबकि संजय गांधी की अल्पसंख्यक विरोधी राजनीति इसके उलटा जाती है।

कांग्रेस के 1977 में हारने के बाद कई किताबों और लेखों में संजय गांधी की नसों में दौड़ रही निरंकुशता के बारे में जिक्र किया गया। प्रेस पर पाबंदी, विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारी, तुर्कमान गेट के पास मुस्लिम स्लम की बर्बादी, जबरन नसबंदी और चापलूसों की मदद से सरकार चलाना कोई ढकी-छुपी बात नहीं है। लेकिन, इस समय की सबसे खतरनाक बात थी, संजय गांधी द्वारा लोकतंत्र की हत्या की कोशिश।

इंदिरा गांधी के पूर्व मुख्य सचिव पी.एन.धर अपनी किताब 'इंदिरा गांधी, द इमर्जेंसी ऐंड इंडियन डेमोक्रेसी' में बताते हैं कि जब इंदिरा गांधी 19 महीनों की इमर्जेंसी के बाद चुनाव कराना चाहती थीं तो संजय ने जी-जान से इंदिरा गांधी का विरोध किया था। 8 दिन के भारी विरोध के बाद इंदिरा गांधी संजय लोकतंत्र की वापसी के लिए सहमत कर पाई थीं।

संजय चाहते थे कि नेहरू-गांधी परिवार ही हमेशा इस देश पर राज करे। वह इंदिरा गांधी को इस बात के लिए उकसा रहे थे कि स्वर्ण सिंह की अध्यक्षता में 12 सदस्यों की समिति गठित की जाए जो भारत के लिए नया संविधान बनाए। इसमें यह प्रस्ताव भी था कि इंदिरा गांधी आजीवन भारत की राष्ट्रपति बनी रहें और उनके परिवार के पास हमेशा शासन करने का अधिकार रहे। नया संविधान आसानी से पास हो जाए, इसके लिए संजय गांधी हरियाणा, पश्चिम बंगाल और पंजाब की विधानसभाओं में भी गए थे। संयोग से इमर्जेंसी खत्म कर दी गई और कांग्रेस अपने इस योजना को अमल लाने से पहले ही सत्ता से बाहर हो गई।

यह बहुत चौंकाने वाला नहीं है कि बीजेपी कई बार संजय गांधी के पक्ष में दिखती है। संजय गांधी के राष्ट्र निर्माण की अवधारणा में बीजेपी और आरएसएस अपने कट्टर हिंदू राष्ट्रवाद की छवि देखते थे। यहां तक कि इमर्जेंसी में जब संघ और आरएसएस के कई नेता जेल में थे तब भी संघ के कई कार्यकर्ताओं ने दिल्ली में संजय गांधी के गुणगान में सम्मान आयोजित किया था। यह तब भी दिखा जब संजय गांधी के बेटे और बीजेपी के सांसद वरुण 2009 में सांप्रदायिक भाषण देने के आरोप में जेल में थे तब जेल के बाहर बीजेपी कार्यकर्ताओं ने संजय गांधी के पक्ष में नारे लगाए थे।

बीजेपी ऑफिस पहुंचे तिवारी, अटकलें तेज

देहरादून।। उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वयोवृद्ध नेता नारायण दत्त तिवारी के भारतीय जनता पार्टी के राज्य मुख्यालय में जाने और लोगों को आशीर्वाद देने से राज्य में अलग-अलग अटकलें लगाई जाने लगी हैं। तिवारी रविवार को अचानक बीजेपी ऑफिस पहुंचे और कार्यालय प्रभारी उर्बादत्त भट्ट से भेंट की। उस समय कार्यालय में कोई बड़ा नेता नहीं था, लेकिन तिवारी ने अपने चिर परिचित अंदाज में वहां उपस्थित लोगों को नए साल की शुभकामना देते हुए आशीर्वाद दिया।

तिवारी ने भट्ट से बातचीत की और उनसे आग्रह किया कि वह उनकी शुभकामना को पार्टी के दूसरे नेताओं तक जरूर से पहुंचा दें। इस सिलसिले में बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष बिशन सिंह चुफाल ने बताया कि उन्हें तिवारी के आने की पहले से कोई सूचना नहीं थी। तिवारी इस राज्य के बुजुर्ग नेता है और सभी लोग उनका सम्मान करते हैं।

दूसरी ओर तिवारी के बीजेपी ऑफिस पहुंचने से राजनैतिक गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म रहा। हालांकि, बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं में इन चर्चाओं पर विराम लगाते हुए कहा कि तिवारी अब दलगत राजनीति से ऊपर उठ चुके हैं और सभी लोग उनका सम्मान करते हैं।

तिवारी आंध्र प्रदेश के राज्यपाल के तौर पर एक सेक्स स्कैंडल में फंसने के बाद इस्तीफा देकर उत्तराखंड में ही रह रहे हैं तिवारी को बीजेपी वरिष्ठ नेताओं में अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी का करीबी समझा जाता है। तिवारी ने पिछले दिनों मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक के साथ एक मंच पर एक कार्यक्रम के दौरान बैठकर लोगों को आश्चर्य में डाल दिया था।