Friday, May 20, 2011

सरकारी कैन्टीनो में महकेगी लोकव्यंजनो की खुशबु

मंडुए की रोटी, भट्ट की चुड़कानी, झंगोरे की खीर भी होगी उपलब्ध।

देहरादून। नारायण परगांई। उŸाराखण्ड के लोक व्यंजनों की खुशबु अब सरकारी कैन्टीनो में नजर आएगी। यह उŸाराखण्ड में पहली बार होगा जब लोक व्यंजनो का लजीज स्वाद जनता चटकारे के साथ इन कैन्टीनों में ले सकेगी। इस योजना को मिड में दिए जाने वाले बच्चों के भोजन में भी लागू किए जाने की बातें सामने आ रही हैं और यह यदि मिड डे की बजाए लोक व्यंजनों को बच्चों के बीच परोसा गया तो जहां रोजगार के नए आयाम खुलेंगे वहीं इसका प्रचार प्रसार भी तेजी से हो सकेगा। लोक व्यंजनो की खुशबु वर्तमान में लगने वाले मेलों में देखने को देखने को मिलती थी जिसे बड़ी संख्या में लोगो द्वारा पसंद किया जाता था। इसके साथ ही पहाड़ी व्यंजनो का स्वाद फीका ना पड़ जाए इसे ध्यान में रखते हुए प्रदेश के मुख्यमंत्री डा. रमेश पोखरियाल निशंक ने निर्देश जारी कर सभी सरकारी कैन्टीनो में लोकव्यंजनो को प्रमुखता से बनाने के निदेश संबन्धित अधिकारियो को दिए हैं। इसके साथ ही खान पान पर विशेष सावधानी बरतते हुए शुद्ध भोजन जनता को उपलब्ध कराने की बात भी कही है। अब तक लोकव्यंजनो का स्वाद पहाड़ी क्षेत्रों में तो शादी या अन्य समारोह में उपलब्ध हो जाता था और इन व्यंजनो का स्वाद सिर्फ पहाड़ तक ही सिमटा हुआ था जिस कारण लोक व्ंयजनो का स्वाद प्रदेश की जनता भरपूर तरीके से नही ले पा रही थी। घर पर बनाए जाने वाले लोक व्यंजन अब यदि आपको सरकारी कैन्टीनो मे मिलते हुए दिखे तो चैंकिएगा नही क्योकि प्रदेश सरकार ने अब कुमाउ व गढ़वाल के लोकव्यंजनो को सरकारी कैन्टीनो में उपलब्ध कराने का फरमान जारी कर दिया है। इसके साथ ही स्कूलो में मिड डे योजना के तहत स्कूली बच्चो को दिया जाने वाला भोजन बेहद खराब आंका जा रहा है जिसकी गम्भीरता को देखते हुए इन स्कूलो में स्कूली बच्चो को लोक व्यंजनो का स्वाद उपलब्ध कराने की बाते भी उठने लगी हैं। कुछ समय पूर्व स्कूलो में खाना बनाए जाने को लेकर विवाद की स्थिति भी उठ खड़ी हुई थी जिससे बच्चो को भारी परेशानियो का सामना करना पड़ा था लेकिन अब स्क्ूली बच्चो को लोक व्ंयजनो का स्वाद मिलने लगेगा तो इससे पहाड़ी व्यंजन और अधिक प्रचारित भी हो सकेगे। कुमाउ में बनाए जाने वाले लोकव्यंजनो में मंडुए की रोटी, भट्ट की चुड़कानी, डुपका, झोली, के साथ साथ गढ़वाल में झंगोरे की खीर, दालो की चैसनी, स्वाली, अरसा, थिचुड़ी, कनाली की सब्जी के साथ साथ अन्य व्यंजन अब आपको सरकारी कैन्टीनो में खाने को मिल सकेंगे। मुख्यमंत्री के निर्देश के बाद सरकारी अमला भी अब कैन्टीनो में उपलब्ध होने वाले खाने पर विशेष नजर रखेगा और यदि सरकारी कैन्टीनो में लोकव्यंजन नही मिले तो उनके खिलाफ कठोर कार्यवाही भी की जा सकती ळै। इस व्यवस्था से जहां उŸाराखण्ड के लोक व्यंजन बनाने वाले लोगो को रोजगार मिलेगा वही लोकव्यंजनों की खुशबु से सरकारी कैन्टीने महक उठेंगी। इस योजना के लागू होने के बाद अब कोई भी उŸाराखण्डी अपने लोक व्यंजनों को खाए बिना नही रह सकेगा। प्रदेश के मुख्यमंत्री जल्द ही कई ऐसी योजनाओ को भी लागू कर सकते हैं जो जनता का दिल जीत सकती हैं।

Tuesday, May 3, 2011

मौत की नींद सोते पुलिसकर्मी।

दो दायित्वधारियो के गनर लगा चुके हं मौत को गले। मानसिक व राजनैतिक दबाव के चलते बड़ रही हैं घटनाएं। देहरादून।। पुलिस महकमे के जवान लगामर मौत को गले लगाकर महकमे की नींद उड़ा रहे हैं। लगातार आत्मघाती कदम उठाये जाने से पुलिस महकमा भी परेशान हो उठा है। पिछले 3 महीने के अन्दर सरकार के दो दायित्व धारियों के गनरो ने अपने सरकारी हथियारो से मौत को गले लगाकर यह बात साबित कर दी है कि उन पर काम का बोझ काफी है जिस कारण वह लगातार इस तरह के कदम उठाकर पूरे महकमे को सोचने पर मजबूर कर रहे हैं। अब तक सेना के जवानो द्वारा ही मानसिक तनाव के चलते मौत को गले लगाए जाने की खबरे सुनाई देती थी लेकिन अब उत्तराखण्ड पुलिस के ऐसे पुलिस कर्मी जो अभी 25 से 30 की उम्र के हो उनके द्वारा आत्मघाती कदम उठाए जा रहे हैं। पुलिस महकमे में लगातार इस तरह की घटनाएं बड़ती जा रही है जो विभाग के लिए अब सिरदर्द बनती नजर आ रही हैं। पूर्व डीजीपी सुभाष जोशी द्वारा मानसिक तनाव कम किए जाने को लेकर प्रत्येक माह महकमे को अपडेट किए जाने के निर्देश सभी जिलो के पुलिस कप्तानो को दिए गए थे और साथ ही इस तरह की घटनाएं रोकने के लिए भी आवश्यक कार्यवाही किए जाने की बात कही गई थी लेकिन अभी तक किसी जिले में इस तरह की घटनाओं को राकने के लिए कोई कार्यक्रम आयोजित नही किए गए और ना ही पुलिस कर्मियो को मानसिक तनाव कम करने के लिए कोई जरूरी इन्तजाम किए गए। लगामार महकमें में पुलिस कर्मी मानसिक तनाव के चलते मौत को गले लगाते जा रहे हैं जो पुलिस महकमें के लिए खतरे की घंटी से कम नही हैं। पुलिस के आलाअघिकारी भी मानते है कि काम के बोझ के साथ साथ राजनैतिक दबाव के चलते इस तरह की घटनाएं लगातार बड़ रही है लेकिन राजनैतिक दबाव के चलते अभी तक किसी भी पुलिस कर्मी द्वारा आत्मघाती कदम उठाए जाने की बाते सामने नही आई हैं और अब तक जितने भी पुलिस कर्मियो द्वारा आत्मघाती कदम उठाए गए उन सभी में मानसिक तनाव की बातें प्रमुख रूप से सामने आई हैं। इसके साथ ही सत्ता में भाजपा की सरकार के आने के बाद से सरकार के 2 दायित्व धारियों जिनमे सबसे पहले हल्द्वानी के दायित्वधारी हेमन्त द्विवेदी के गनर गुड्डु साहु एवं देहरादून के दायित्वधारी सैनिक प्रकोष्ठ के अध्यक्ष श्री कुड़याल का गनर दिनेश कुमार अपने को मौत की नींद सुला चुका है और इससे पहले वर्ष 2001 में हरिद्वार में तैनात एलआइयू का पुलिस कमी रामराज पवार, देवप्रयाग चैकी हिन्डोला खाल में एक कान्सटेबल, पिथौरागड़ में एक कान्सटेबल वर्ष 2009 में नैनीताल में सूरज कुमार जगवीर सिंह, वर्ष 2010 में वीजेन्द्र कुमार एवं इसके अलावा कई पुलिसकर्मी संदिग्ध परिस्थितियों में मौत की नींद सोते मिल चुके हैं। जिस कारण लगातर पुलिस कर्मियो द्वारा आत्मघाती कदम उठाए जाने के पीछे मानसिक तनाव एवं राजनैतिक दबाव सामने खुलकर आया है वहीं कई मामलो में मौत के कारणो की विभागीय जांच तक नही की जा सकी है जिस कारण अभी भी कई पुलिस कर्मियो की मौत की गुत्थी उलझाी हुई है। एक तरफ पुलिस महकमा जनता को मित्रता सेवा सुरक्षा का नारा देकर आगे बड़ाने की बात कह रहा है वही दूसरी तरफ पुलिस के जवान लगातार मौत को गले लगाते जा रहे है। इतना ही नहीं रूद्रपुर में 30 मार्च को आर्शीवाद अस्पताल में अर्जुनधर की हुई मौत के बाद अभी तक उसके बिसरे की जांच पूरी नही हो सकी है और रूद्रपुर के ही करीब सात आठ लोग के भेजे गए बिसरो को आगरा से लौटा दिया गया है और कई मामलो में अभी बिसरो की जांच पूरी ना हो पाने के चलते कार्यवाही बधर में लटकी हुई है। बिसरो की जांच समय पर किए जाने को लेकर गदरपुर पंतनगर विघायक पे्रमानंद महाजन ने जनपद के एसएसपी अजय रौतेला व आईजी रामसिंह मीढ़ा को भी समय पर जांच पूरी करवाने के लिए कहा है। कुल मिलाकर पुलिस महकमे में लगातार आत्मघाती कदम रोकने के लिए कोई ठोस प्रक्रिया को अंजाम नही दिया जा सका है।